ट्रिपल मार्कर टेस्ट (Triple Marker Test) एक महत्वपूर्ण प्रसव पूर्व (prenatal) स्क्रीनिंग टेस्ट है। यह गर्भावस्था के दौरान किया जाता है ताकि यह पता लगाया जा सके कि विकासशील भ्रूण में डाउन सिंड्रोम या न्यूरल ट्यूब दोष जैसे आनुवंशिक (genetic) या जन्मजात विकार होने का खतरा तो नहीं है।
यह टेस्ट कैसे किया जाता है और इसके मुख्य उपयोग क्या हैं, इसकी जानकारी नीचे दी गई है:
टेस्ट में क्या मापा जाता है?
यह टेस्ट एक साधारण रक्त परीक्षण (Blood Test) के माध्यम से किया जाता है, जिसमें माँ के खून में 3 प्रमुख पदार्थों के स्तर को मापा जाता है:
- AFP (अल्फा-फेटोप्रोटीन): भ्रूण द्वारा उत्पादित एक प्रोटीन।
- hCG (ह्यूमन कोरियोनिक गोनाडोट्रोपिन): प्लेसेंटा द्वारा निर्मित हार्मोन।
- Estriol (एस्ट्रियोल): भ्रूण और प्लेसेंटा द्वारा निर्मित एक प्रकार का एस्ट्रोजन।
टेस्ट के मुख्य उपयोग
- आनुवंशिक विकारों का जोखिम: इससे अजन्मे बच्चे में डाउन सिंड्रोम (Down’s syndrome) और एडवर्ड्स सिंड्रोम (Edwards syndrome) जैसी गुणसूत्र संबंधी (chromosomal) असामान्यताओं के जोखिम का आकलन किया जाता है।
- न्यूरल ट्यूब दोष (Neural Tube Defects): यह स्पाइनल कॉर्ड (रीढ़ की हड्डी) और मस्तिष्क से जुड़े जन्मजात दोषों, जैसे स्पाइना बिफिडा का पता लगाने में उपयोगी है।
- सही समय पर निर्णय: यह परीक्षण माता-पिता और डॉक्टरों को गर्भावस्था के प्रबंधन की योजना बनाने में मदद करता है।
कब किया जाता है?
यह टेस्ट आमतौर पर गर्भावस्था के 15वें से 20वें सप्ताह के बीच किया जाता है (16वें से 18वें सप्ताह में इसे सबसे सटीक माना जाता है)।
ध्यान रखने योग्य बात
यह टेस्ट कोई निश्चित (diagnostic) जांच नहीं है। यह केवल जोखिम का अनुमान लगाता है। यदि टेस्ट रिपोर्ट में जोखिम अधिक आता है, तो डॉक्टर आगे की पुष्टि के लिए अन्य परीक्षणों, जैसे कि अल्ट्रासाउंड या एमनियोसेंटेसिस (Amniocentesis) की सलाह देते हैं।
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