डबल मार्कर टेस्ट गर्भावस्था के पहले ट्राइमेस्टर (11 से 14 सप्ताह के बीच) में किया जाने वाला एक आवश्यक रक्त परीक्षण है। इसका मुख्य उपयोग भ्रूण में क्रोमोसोमल (आनुवंशिक) असामान्यताओं, जैसे डाउन सिंड्रोम, एडवर्ड्स सिंड्रोम और पटाऊ सिंड्रोम के जोखिम का आकलन करना है。
डबल मार्कर टेस्ट के मुख्य उपयोग और उद्देश्य:
- आनुवंशिक जोखिम का पता लगाना: यह टेस्ट भ्रूण में गुणसूत्रों की गड़बड़ी के जोखिम को मापता है । यह विशेष रूप से डाउन सिंड्रोम (ट्राइसोमी 21), एडवर्ड्स सिंड्रोम (ट्राइसोमी 18) और पटाऊ सिंड्रोम (ट्राइसोमी 13) जैसी स्थितियों की जांच करता है。
- दो मुख्य हार्मोन्स की जांच: इस रक्त परीक्षण में मुख्य रूप से दो पदार्थों को मापा जाता है :
- फ्री बीटा-एचसीजी (Free Beta-hCG): प्लेसेंटा द्वारा उत्पादित हार्मोन ।
- पीएपीपी-ए (PAPP-A – Pregnancy-Associated Plasma Protein-A): गर्भावस्था से जुड़ा प्लाज्मा प्रोटीन。
- एनटी स्कैन के साथ तालमेल: सर्वोत्तम परिणामों के लिए, इस रक्त परीक्षण को आमतौर पर अल्ट्रासाउंड के जरिए किए जाने वाले एनटी (Nuchal Translucency) स्कैन के साथ जोड़ा जाता है । एनटी स्कैन में बच्चे की गर्दन के पीछे के तरल पदार्थ को मापा जाता है。
- आगे के टेस्ट का मार्गदर्शन: यदि इस स्क्रीनिंग रिपोर्ट में जोखिम अधिक आता है, तो डॉक्टर स्थिति को स्पष्ट करने के लिए आगे नैदानिक परीक्षण (जैसे एनआईपीटी या एम्नियोसेंटेसिस) कराने की सलाह दे सकते हैं ।
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